Thursday, July 22, 2010

आज़ाद हिंद

आज़ाद हिंद का सीना हो,
जीवन ऐसा की जीना हो,
वो राष्ट्र-प्रेम का सम्मान हो,
जिसमें कल की कोई फरियाद न हो,
वो झांकता सूरज अपना हो,
रौशनी ऐसी कहीं और न हो,
राह भटकते युवकों के मन में,
वो जीने का कोई खौफ न हो,
जब देखे दुनिया होशियारी,
तो कहें हमने सींची क्यारी,
वो अपंग का मन चोटिल न हो,
कोई चुनौती इतनी जटिल न हो,
कह दें अगर हम माटी से,
कोई ज़मीं इतनी बंजर न हो,
आये अगर अवरोध सही,
कोई चोट हमारी कम न हो॥ कोई चोट हमारी कम न हो.....

नया भारत बनाने का संघर्ष,
हुए स्वतंत्रता के ६० वर्ष...

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