Monday, October 04, 2010

कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे

साँसें ग़ुम हो गयी किसी की आहों में,
उनकी महफ़िल सज गयी किसी और की बाहों में,
हम तलाशते रह गए उनको कारवाँ-ए-हुस्न पे,
कहते हैं --- कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे....

5 comments:

  1. आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
    आज बनता और कल फिर फूट जाता है
    किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?
    बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है

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  2. yaar isko thoda aur badhao na

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  3. @Ashish Yadav ji: many thanks sir.. keep motivating me..

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