कभी-कभी खुद से पूछता हूँ,
अंतःमन टटोलता हूँ
टूटे सपनों में रंग ढूंढता हूँ,
खिलती कली की उमंग ढूंढता हूँ
गगन में उड़ती पतंग देखता हूँ और पूछता हूँ कि....
इन सबके बीच
एक मन उदास क्यूँ है
उस पल कि तलाश क्यूँ है
जीने का एहसास, इतना पुराना क्यूँ है??
जवाब मिलता है---
क्यूंकि कुछ रंग हैं पुराने,
कुछ गीत हुए बेगाने
कुछ मीत हुए अनजाने
भयभीत हुए तराने
सब सपने लगे चिढ़ाने
दाना चुगते पक्षी को
सब बच्चे लगे उड़ाने.....
सोचता हूँ, कि खुद को थोड़ा बदल लूँ,
थोड़ा अक्ल लूँ,
पत्थर को देखकर, थोड़ा पिघल लूँ
पर जी कहता है, थम जा... क्यूंकि ये वक़्त भी थोड़ा थम सा गया है....
खुबसूरत रचना ...........शब्द संयोजन अति सुन्दर ..........
ReplyDeletedhanyawad ana ji...
ReplyDeletelovely!!!!
ReplyDelete@ manjari
ReplyDeletethnx ji..